अभी अभी
उग्र दक्षिणपंथी गंभीर संदीप के इस लेख से ज्ञात हुआ कि बीतें दिनों मुंबई के एक कुख्यात अड्डे में कुछ उग्रपंथी इक्कठे होकर प्रति-क्रातिंकारी योजनाएं गढ रहें थे.उनका लक्ष्य समाजवादी भारतीय गणराज्य से समाजवाद हटाना है.
एक मानदतावादी होने के नाते मेरा दृण विश्वास है कि, बिना परिश्रम दूसरों का माल खाना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है.
भारत के कई जयचंदों, कांग्रेसियों, कम्युनिस्टों महान नेताओं नें भारतीयों को यह अधिकार प्राप्त हो इसके लिए कितने बलिदान दिए.
परंतु आज इस अधिकार को कुछ पूँजीवादियों के घृणित प्रयासों से खतरा है. यह लोग तर्क एव आकडों के माध्यम से भारत में "फ्री मार्केट" तथा उदारीकरण लाना चाहतें हैं. यह विश्व विदित है कि तर्क और आंकडें सर्वहारा के शोषण के लिए एक अमरीकी "कान्सपीरेसी" है
अर्जुन सिंह और दूसरे भारत के विद्वजन हमारे मुफ्तखोरी के अधिकार की रक्षा का पूरा प्रयास कर रहें है, किंतु इन साम्राज्यवादियों के छल प्रपंचों के आगे अपने को विवश पातें हैं.एक भारतीय का यह कर्तव्य है कि वह इनका प्रतिकार है ताकि हमारे गणराज्य के डकैतवादी समाजवादी स्वरूप की रक्षा हो सके.
आखिर मे यह शब्द
अजगर करे ना चाकरी पंछी करे ना काम, दास मलूका कह गये सबके दाता राम.
नितिन जी ने भी इस पर लिखा है, परंतु षड्यंत्र के बारे में कुछ नही लिखा है. सच तो हम कबूलवा ही लेंगें, चाहे इसके लिए उन बुर्जुआ लोगों को करन जौहर की फिल्में क्यों न दिखानी पडें

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